मई में ही तैयार कर लें खेत, जून में करें बुवाई, 90 दिनों में होगा मोटा मुनाफा
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तिल की खेती से कम पानी वाले इलाकों के किसान इस बार अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं लेकिन इसके लिए खेत की तैयारी समय से करना बेहद जरूरी है. कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक मई के मध्य से ही गहरी जुताई, जल निकासी और डीएपी खाद का सही इस्तेमाल करने से जून में बुवाई के बाद फसल तेजी से बढ़ती है और 90 दिनों में किसानों को शानदार उत्पादन मिल सकता है.
सतना: विंध्य क्षेत्र के किसानों के लिए जून का महीना तिल की खेती शुरू करने का सबसे अहम समय माना जाता है. खासकर सतना और रीवा जैसे इलाकों में जहां कई जगह पानी की कमी और पथरीली जमीन खेती को चुनौती बना देती है वहां तिल किसानों के लिए कम लागत में ज्यादा कमाई वाली फसल साबित हो रही है. कम पानी, कम खाद और कम समय में तैयार होने वाली यह फसल अब किसानों की पहली पसंद बनती जा रही है. यही वजह है कि इस बार कई किसान धान की जगह तिल की खेती की तैयारी में जुट गए हैं. कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि अगर खेत की तैयारी और शुरुआती देखभाल सही तरीके से की जाए तो तिल की खेती किसानों को 80 से 90 दिनों में शानदार मुनाफा दे सकती है.
लोकल 18 को जानकारी देते हुए खेती विशेषज्ञ अमित सिंह ने बताया कि जून में तिल की बुवाई करनी है तो खेत की तैयारी मई के मध्य के बाद से ही शुरू कर देनी चाहिए. तिल का बीज बहुत छोटा होता है इसलिए खेत की मिट्टी पूरी तरह भुरभुरी और बारीक होना जरूरी है. इसके लिए सबसे पहले मिट्टी पलटने वाले हल से 1 से 2 गहरी जुताई करें. इसके बाद कल्टीवेटर और रोटावेटर चलाकर मिट्टी को अच्छी तरह तैयार करें. तिल की फसल जलभराव बिल्कुल सहन नहीं करती इसलिए खेत में पानी निकासी की व्यवस्था पहले से कर लेना जरूरी है. जुताई के समय प्रति एकड़ करीब 4 से 5 टन सड़ी हुई गोबर खाद खेत में मिला दें. अगर गोबर खाद उपलब्ध नहीं है तो बुवाई से पहले 30 से 40 किलो डीएपी या एनपीके खाद मिट्टी में अच्छी तरह मिला सकते हैं. अंत में खेत में पाटा चलाकर जमीन को समतल कर लें ताकि बारिश आने पर नमी बराबर बनी रहे और बीजों का अंकुरण अच्छा हो सके.
कम पानी में भी देता है बेहतर उत्पादन
तिल को सूखा सहन करने वाली फसल माना जाता है. इसे धान की तरह ज्यादा पानी की जरूरत नहीं होती. विंध्य के ऊंचे और पथरीले इलाकों में यह फसल केवल बारिश के भरोसे अच्छी पैदावार दे देती है. यही वजह है कि कम सिंचाई वाले किसान अब तिल की खेती की तरफ तेजी से बढ़ रहे हैं. इस फसल में खाद और कीटनाशकों का खर्च भी काफी कम आता है. बड़ी बात यह है कि तिल की फसल सिर्फ 80 से 90 दिनों में पककर तैयार हो जाती है. इससे किसानों को जल्दी नगद आमदनी मिल जाती है और अक्टूबर तक खेत खाली होने से रबी सीजन में गेहूं और चने की बुवाई भी समय पर हो जाती है. सतना और रीवा की गल्ला मंडियों में तिल की भारी मांग रहती है जहां इसका बाजार भाव करीब 7 हजार से 10 हजार रुपये प्रति क्विंटल तक मिल जाता है.
इन कीटों से फसल को सबसे ज्यादा खतरा
तिल की खेती में इल्लियों वाले कीट किसानों के लिए बड़ी परेशानी बन जाते हैं. इनमें सबसे खतरनाक पत्ता लपेटक और फली छेदक कीट माना जाता है. इसकी इल्लियां पत्तियों को जाले की तरह लपेटकर खाती हैं और बाद में फलियों में छेद कर दानों को नुकसान पहुंचाती हैं. इसके अलावा हरा फुदका भी फसल को नुकसान पहुंचाता है. यह पत्तियों का रस चूसता है और फाइलोडी रोग फैलाता है जिससे फूल पत्तियों के गुच्छे में बदल जाते हैं. वहीं इल्लियों के अलावा जैसे गाल मक्खी फूलों की कलियों पर हमला कर उन्हें गांठ जैसा बना देती है जबकि हॉक मॉथ की हरी सूंडियां तेजी से पत्तियां खाकर पूरे पौधे को नुकसान पहुंचाती हैं. उन्होंने कहा कि इनसे बचाव के लिए बीज उपचार जरूर करना चाहिए और जरूरत पड़ने पर इमिडाक्लोप्रिड या क्विनालफॉस का छिड़काव करना चाहिए.
तिल की खेती में डीएपी खाद काफी फायदेमंद साबित होती है. इसमें मौजूद नाइट्रोजन पौधों की शुरुआती वृद्धि तेज करता है और पत्तियों को गहरा हरा बनाता है. वहीं फॉस्फोरस जड़ों को मजबूत करता है जिससे पौधे सूखा भी आसानी से सहन कर लेते हैं. डीएपी के इस्तेमाल से फसल में समय पर ज्यादा फूल आते हैं फलियों का आकार बड़ा होता है और दानों में तेल की मात्रा व चमक बढ़ जाती है. बुवाई के समय प्रति एकड़ 30 से 40 किलो डीएपी डालने से पौधों की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी मजबूत होती है. सही मात्रा में डीएपी के उपयोग से तिल की पैदावार में 20 से 25 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हो सकती है.
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