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पानी और धूप से 51% ज्यादा पैदा होगी ग्रीन हाइड्रोजन, आईआईटी गुवाहाटी के वैज्ञानिकों ने खोजी कमाल की नई तकनीक

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पानी और धूप से 51% ज्यादा पैदा होगी ग्रीन हाइड्रोजन, IIT ने खोजी कमाल की तकनीक

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Green Hydrogen Production: आईआईटी गुवाहाटी के रिसर्चर्स ने हरित हाइड्रोजन उत्पादन बढ़ाने के लिए एक नई तकनीक विकसित की है. इस खास कम्पोजिट कोटिंग तकनीक से हाइड्रोजन के उत्पादन में 51 प्रतिशत से अधिक की भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है. यह तकनीक सूरज की रोशनी से पानी को अलग करने के दौरान बनने वाले गैस के बुलबुलों को सतह पर चिपकने से रोकती है. इससे भविष्य में स्वच्छ ईंधन का उत्पादन बहुत आसान हो जाएगा.

पानी और धूप से 51% ज्यादा पैदा होगी ग्रीन हाइड्रोजन, IIT ने खोजी कमाल की तकनीकZoom

ग्रीन हाइड्रोजन के उत्पादन में 51 फीसदी का बंपर उछाल, आईआईटी के वैज्ञानिकों ने कैसे किया यह कमाल? (Photo made with AI)

नई दिल्ली: आईआईटी गुवाहाटी के रिसर्चर्स ने एक ऐसी अत्याधुनिक तकनीक विकसित की है, जिससे ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन पहले के मुकाबले काफी ज्यादा और प्रभावी तरीके से किया जा सकता है. वैज्ञानिकों का दावा है कि इस नई स्वदेशी तकनीक के इस्तेमाल से हाइड्रोजन उत्पादन में 51 प्रतिशत से अधिक की रिकॉर्ड बढ़ोतरी दर्ज की गई है. इस रिसर्च के सामने आने के बाद पूरी दुनिया के वैज्ञानिक हैरान हैं. इस खोज से भारत आने वाले समय में पूरी दुनिया के लिए क्लीन एनर्जी का सबसे बड़ा हब बनकर उभर सकता है. ग्रीन हाइड्रोजन को भविष्य का सबसे सुरक्षित और स्वच्छ ईंधन माना जा रहा है, क्योंकि इसके इस्तेमाल से पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं पहुंचता है.

ग्रीन हाइड्रोजन क्या है और यह पारंपरिक ईंधन से अलग क्यों है?

आज के समय में पूरी दुनिया प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग जैसी गंभीर समस्याओं से जूझ रही है. ऐसे में जीवाश्म ईंधन जैसे पेट्रोल और डीजल पर निर्भरता कम करने के लिए ग्रीन हाइड्रोजन एक बेहतरीन विकल्प बनकर उभरा है. सामान्य तौर पर जब पारंपरिक तरीकों से हाइड्रोजन बनाई जाती है, तो भारी मात्रा में खतरनाक ग्रीनहाउस गैसें निकलती हैं. इसके विपरीत ग्रीन हाइड्रोजन पूरी तरह प्रदूषण मुक्त होती है. इसे पर्यावरण के अनुकूल बनाने के लिए सूर्य के प्रकाश की मदद ली जाती है. इस प्रक्रिया में धूप के जरिए पानी को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में अलग करके स्वच्छ ईंधन तैयार किया जाता है.

वैज्ञानिकों के सामने कौन सी दो बड़ी चुनौतियां आ रही थीं?

सूर्य की रोशनी से पानी को अलग करके ग्रीन हाइड्रोजन बनाने की राह में अब तक दो बहुत बड़ी समस्याएं आ रही थीं. पहली दिक्कत यह थी कि इलेक्ट्रोड पर लगी उत्प्रेरक यानी कैटेलिस्ट की परत समय के साथ कमजोर होकर हटने लगती थी. दूसरी सबसे बड़ी समस्या यह थी कि प्रक्रिया के दौरान बनने वाले गैस के बुलबुले सतह पर चिपक जाते थे. इन बुलबुलों के चिपकने से हाइड्रोजन उत्पादन की गति बहुत धीमी हो जाती थी. पूरी दुनिया के वैज्ञानिक लंबे समय से इन दोनों गंभीर चुनौतियों का तोड़ तलाशने में जुटे हुए थे.

आईआईटी गुवाहाटी के रिसर्चर्स ने क्या समाधान निकाला?

इन्हीं मुश्किल चुनौतियों का स्थायी समाधान खोजते हुए आईआईटी गुवाहाटी के वैज्ञानिकों ने एक खास कम्पोजिट कोटिंग तैयार की है. रिसर्चर्स ने कार्बन नाइट्राइड नामक एक विशेष प्रकाश-सक्रिय पदार्थ को बुलबुला-रोधी हाइड्रोजेल परत के साथ निकेल फोम पर सफलतापूर्वक जोड़ा है. पारंपरिक तरीकों में फोटोकैटेलिस्ट को सतह पर एक बिल्कुल अलग परत के रूप में लगाया जाता था. इस नई तकनीक में रिसर्चर्स ने इसे सीधे कोटिंग के अंदर ही शामिल कर दिया है. इससे कैटेलिस्ट पहले से कहीं ज्यादा सुरक्षित हो गया है.

क्या भारत ने ढूंढ लिया भविष्य का सबसे सस्ता ईंधन? (Photo made with AI)

इस जादुई कोटिंग से उत्पादन में कितनी बढ़ोतरी दर्ज की गई?

इस नई खास परत की वजह से गैस के बुलबुले सतह पर टिक नहीं पाते हैं और उत्पादन की प्रक्रिया बिना रुके लगातार चलती रहती है. कैटेलिस्ट के अंदर होने से पानी को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में विभाजित करने के लिए अधिक सक्रिय सतह मिल जाती है. आईआईटी गुवाहाटी के मुताबिक यह नई तकनीक पुरानी सभी प्रणालियों की तुलना में बहुत शानदार परिणाम दे रही है. इस सफल प्रयोग से हाइड्रोजन उत्पादन में 51 फीसदी से ज्यादा की वृद्धि हुई है. इसके साथ ही ऑक्सीजन उत्पादन में भी 44 प्रतिशत की बढ़ोतरी देखी गई है.

देश के बड़े वैज्ञानिकों का इस नई खोज पर क्या कहना है?

इस ऐतिहासिक रिसर्च को आईआईटी गुवाहाटी के प्रो. उत्तम मन्ना और प्रो. मोहम्मद कुरेशी के नेतृत्व में डॉ. हृषिकेश सरमा, अल्पना साहू, अंशिका चौधरी, सुमंत सरकार, सौरव मंडल और लिंगराज साहू ने मिलकर पूरा किया है. प्रो. उत्तम मन्ना ने बताया कि इस तकनीक को भविष्य में व्यापक रूप से लागू किया जा सकता है. आने वाले समय में अन्य उत्प्रेरकों का भी परीक्षण किया जाएगा. प्रोफेसर मोहम्मद कुरेशी के मुताबिक अगले चरण में इस तकनीक को बड़े उपकरणों पर लागू करने और व्यावहारिक सौर हाइड्रोजन उत्पादन प्रणालियों में इस्तेमाल करने पर काम किया जाएगा. फिलहाल यह रिसर्च प्रयोगशाला स्तर पर है और इसे आगे बड़े स्तर पर आजमाया जाएगा.

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दीपक वर्माDeputy News Editor

दीपक वर्मा News18 हिंदी के डिजिटल न्यूजरूम में डिप्टी न्यूज़ एडिटर के रूप में कार्यरत हैं. पत्रकारिता के क्षेत्र में एक दशक से भी ज्यादा का अनुभव रखने वाले दीपक मुख्य रूप से विज्ञान, राजनीति और भारत के आंतरिक घ…और पढ़ें

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