उत्तर प्रदेश की राजनीति में समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव का बदला हुआ सियासी अंदाज अब खुलकर नजर आने लगा है. कभी मुस्लिम परस्त राजनीति के आरोप झेलने वाले अखिलेश अब सॉफ्ट हिंदुत्व की राह पर बढ़ते दिखाई दे रहे हैं. हिंदुत्व की राजनीति पर बीजेपी की मजबूत पकड़ और बंगाल में ममता बनर्जी के राजनीतिक अनुभव ने भी अखिलेश को अपनी रणनीति बदलने के लिए मजबूर किया है.
लखनऊ में वकीलों पर हुए लाठीचार्ज और एक वकील के हाथ में मौजूद रामचरितमानस की तस्वीर ने अखिलेश यादव को बीजेपी और योगी सरकार पर हमला बोलने का बड़ा मौका दे दिया. इस पूरे घटनाक्रम में सबसे ज्यादा चर्चा उस शब्द की हो रही है, जिसमें पहली बार अखिलेश यादव ने रामचरितमानस को सांस्कृतिक संविधान कहा है. इसके बाद उनकी पार्टी की तरफ से जो हुआ वो हैरान करने वाला था.
दरअसल, समाजवादी पार्टी की प्रवक्ता पूजा शुक्ला ने अस्पताल जाकर घायल वकील को रामचरितमानस की प्रति भेंट की थी. इसके बाद बड़े मंगल के मौके पर अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट लिखकर बीजेपी सरकार को घेरा है. उन्होंने लिखा कि बीजेपी राम का नाम लेकर राजनीति करती है, लेकिन उनकी पुलिस श्रीरामचरितमानस हाथ में लिए वकील पर लाठी बरसाती है.
उन्होंने लिखा, “भाजपा प्रभु राम का नाम अपने राजनीतिक स्वार्थ सिद्धी के लिए करती रही है. जिस प्रकार भाजपा सरकार ने हाथ में श्रीरामचरितमानस लिए हुए अधिवक्ता पर अति निंदनीय हिंसक लाठीचार्ज किया, वो भाजपा की सनातन विरोधी सोच को दर्शाता है. इससे सांस्कृतिक-संविधान रूपी हमारे इस महाकाव्य और महा-मर्यादा ग्रंथ का महा-अपमान हुआ है. भाजपा समाज में साम्प्रदायिकता फैलाती है.”
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अखिलेश यादव लिखते हैं…

रामचरितमानस के बहाने बीजेपी और योगी सरकार पर हमले के साथ-साथ इस पूरे घटनाक्रम ने अखिलेश की बदलती राजनीतिक रणनीति को भी सामने ला दिया है. समाजवादी पार्टी का ब्राह्मण चेहरा मानी जाने वाली पूजा शुक्ला ने भी इस मामले को सनातन का अपमान बताते हुए कहा कि महाग्रंथ का अपमान बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. इसलिए सपा के प्रतिनिधियों ने घायल वकील से मुलाकात की है.
बीते कुछ वर्षों में अखिलेश यादव लगातार अपनी हिंदू पहचान को सार्वजनिक तौर पर सामने रखते दिखे हैं. सैफई में बन रहे केदारेश्वर मंदिर की तस्वीरें और भगवान शिव की पूजा करते हुए उनके परिवार की फोटो कई बार सोशल मीडिया पर सामने आ चुकी हैं. हाल ही में उन्होंने खुद को ज्योतिषों के शरणागत बताते हुए कहा था कि अब वो हर काम ज्योतिष की सलाह के हिसाब से करते हैं.
क्या पहनना है, कब बाहर निकलना है और कब नहीं निकलना है, यह भी ज्योतिष की सलाह से तय होता है. सिर्फ सॉफ्ट हिंदुत्व ही नहीं, ब्राह्मण राजनीति को लेकर भी अखिलेश अब पहले से ज्यादा सतर्क नजर आते हैं. हाल ही में समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता राजकुमार भाटी ने एक कार्यक्रम में ब्राह्मणों की तुलना वेश्याओं से कर दी थी. इसके बाद पार्टी के भीतर बड़ा विवाद खड़ा हो गया.
बताया जाता है कि राजकुमार भाटी को लखनऊ बुलाकर अखिलेश यादव ने बंद कमरे में समझाया. राजनीतिक जानकार मानते हैं कि अखिलेश का यह नया चेहरा अचानक नहीं बना है. पिछले कुछ वर्षों से वह लगातार इस दिशा में काम कर रहे हैं. लोकसभा चुनाव जीतने के बाद संसद में नेता विपक्ष की सीट ब्राह्मण चेहरे माता प्रसाद पांडे को देना भी इसी रणनीति का हिस्सा माना गया.
बीजेपी हालांकि इसे दिखावटी राजनीति करार देती है और लगातार अखिलेश को सनातन व ब्राह्मण विरोधी बताती रही है. लेकिन समाजवादी पार्टी की कोशिश साफ दिखाई दे रही है कि उसकी छवि सिर्फ अल्पसंख्यक राजनीति तक सीमित न रहे. दरअसल, 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले अखिलेश यादव अपनी पहचान एक समावेशी राजनीतिक विकल्प के तौर पर स्थापित करना चाहते हैं.
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