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Mount Everest deaths | एवरेस्ट फतह के बाद मौत का सफर! ‘डेथ जोन’ में गई 2 भारतीय पर्वतारोहियों की जान, तीसरा जिंदगी की जंग लड़ रहा

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दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट एक बार फिर जानलेवा साबित हुई है. एवरेस्ट फतह करने के बाद लौटते समय दो भारतीय पर्वतारोहियों की मौत हो गई, जबकि एक अन्य भारतीय पर्वतारोही की हालत बेहद गंभीर बताई जा रही है. नेपाल की एक्सपेडिशन एजेंसियों के मुताबिक, इस सीजन में एवरेस्ट पर रिकॉर्ड भीड़, खराब हालात और ‘डेथ जोन’ में लंबे समय तक फंसे रहने ने खतरा कई गुना बढ़ा दिया है.

मृतकों में हैदराबाद के टेक प्रोफेशनल अरुण कुमार तिवारी और 46 वर्षीय संदीप अरे शामिल हैं. दोनों ने एवरेस्ट की चोटी फतह कर ली थी, लेकिन वापसी के दौरान उनकी तबीयत बिगड़ गई. अभियान संचालित करने वाली कंपनी पायनियर एडवेंचर के अधिकारियों ने बताया कि दोनों पर्वतारोहियों को नीचे लाने की कोशिश की गई, लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका.

एवरेस्ट से लौटते वक्त बिगड़ी हालत

बताया गया कि संदीप अरे ने बुधवार को एवरेस्ट शिखर पर पहुंचकर सफलता हासिल की थी. उसी दिन नेपाल की ओर से रिकॉर्ड 274 पर्वतारोही एवरेस्ट के टॉप तक पहुंचे थे. लेकिन वापसी के दौरान ‘बालकनी एरिया’ के पास उन्हें स्नो ब्लाइंडनेस और अत्यधिक थकान ने घेर लिया. पांच शेरपा बचावकर्मियों ने पूरी रात बेहद कठिन हालात में उन्हें नीचे लाने की कोशिश की. किसी तरह उन्हें कैंप-2 तक पहुंचाया गया, लेकिन गुरुवार को उनकी मौत हो गई.

वहीं अरुण कुमार तिवारी गुरुवार शाम करीब साढ़े पांच बजे एवरेस्ट के शिखर पर पहुंचे थे. वापसी के दौरान ‘हिलेरी स्टेप’ के पास उनकी तबीयत अचानक गंभीर हो गई. यह हिस्सा एवरेस्ट के सबसे खतरनाक इलाकों में माना जाता है और 8000 मीटर से ऊपर के ‘डेथ जोन’ में आता है. चार शेरपा गाइड्स ने उन्हें संभालने और नीचे लाने की कोशिश की, लेकिन ऑक्सीजन की कमी और बिगड़ती हालत के बीच उनकी जान नहीं बचाई जा सकी.

चार चोटियां फतह कर चुके थे तिवारी

अरुण तिवारी ने एवरेस्ट अभियान से पहले सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म लिंक्डइन पर लिखा था कि वह ‘माउंट एवरेस्ट से शिखर तक जाने की अनुमति मिलने का इंतजार कर रहे हैं.’ उन्होंने साफ आसमान, अनुकूल मौसम और ‘पहाड़ों के देवताओं’ से कृपा की कामना भी की थी. तिवारी ने अपने पर्वतारोहण सफर की शुरुआत 2015 में हिमालयी ट्रेक से की थी. बाद में उन्होंने नंदा देवी ईस्ट बेस कैंप समेत कई कठिन अभियानों में हिस्सा लिया.

तिवारी पहले भी एवरेस्ट चढ़ने की कोशिश कर चुके थे, लेकिन एक अभियान के दौरान उन्होंने खराब हालत और स्नो ब्लाइंडनेस के खतरे को देखते हुए वापसी का फैसला किया था. उन्होंने तब लिखा था कि ‘जीवन को चुनना जरूरी था.’ उनकी प्रोफाइल के मुताबिक, वह सेवन समिट अभियान के तहत पहले डेनाली, अकोंकागुआ, किलिमंजारो और एल्ब्रस जैसी चोटियां भी फतह कर चुके थे.

7900 मीटर की ऊंचाई पर बीमार पड़ा तीसरा भारतीय पर्वतारोही

इधर, एक तीसरे भारतीय पर्वतारोही की हालत भी गंभीर बनी हुई है. यह पर्वतारोही साउथ कोल यानी कैंप-4 के पास करीब 7900 मीटर की ऊंचाई पर बीमार पड़ा है. शेरपा रेस्क्यू टीम उसे नीचे कैंप-2 तक लाने की कोशिश कर रही है ताकि मौसम अनुकूल होने पर हेलीकॉप्टर से एयरलिफ्ट किया जा सके. फिलहाल उसकी पहचान सार्वजनिक नहीं की गई है.

इस बार एवरेस्ट सीजन को सबसे ज्यादा भीड़भाड़ वाला माना जा रहा है. तिब्बत वाला उत्तरी मार्ग बंद होने के कारण लगभग पूरा अंतरराष्ट्रीय दबाव नेपाल के दक्षिणी रूट पर आ गया. नेपाल सरकार ने इस सीजन में 494 परमिट जारी किए थे. हर विदेशी पर्वतारोही के साथ एक शेरपा अनिवार्य होने के कारण फिक्स्ड रोप रूट पर करीब 1000 लोग सक्रिय रहे. कई शेरपा गाइड्स ने भीड़ को लेकर चिंता जताई है और कहा है कि इतनी बड़ी संख्या सुरक्षा के लिए खतरा बनती जा रही है.

सस्ते एवरेस्ट पैकेज ने बढ़ाई भीड़

विशेषज्ञों का कहना है कि एवरेस्ट अभियान की बढ़ती ‘सस्ती प्रतिस्पर्धा’ भी चिंता का बड़ा कारण है. पहले जहां पश्चिमी कंपनियां 50 हजार से 1 लाख डॉलर तक में अभियान कराती थीं, वहीं अब कई नेपाली एजेंसियां 30 से 45 हजार डॉलर में एवरेस्ट पैकेज बेच रही हैं. पर्वतारोहण विशेषज्ञों का मानना है कि कम कीमत की होड़ में सुरक्षा, स्टाफिंग, ऑक्सीजन सपोर्ट और रेस्क्यू सिस्टम प्रभावित हो सकते हैं.

ऊंचाई पर होने वाली बीमारियां भी सबसे बड़ा खतरा हैं. 8000 मीटर से ऊपर ऑक्सीजन बेहद कम हो जाती है, जिससे शरीर और दिमाग दोनों पर असर पड़ता है. स्नो ब्लाइंडनेस, फ्रॉस्टबाइट, हाइपोथर्मिया, हाई एल्टीट्यूड पल्मोनरी एडिमा और सेरेब्रल एडिमा जैसी स्थितियां जानलेवा बन सकती हैं.

एक अध्ययन के मुताबिक, एवरेस्ट पर होने वाली ज्यादातर मौतें शिखर पर पहुंचने के बाद वापसी के दौरान होती हैं. कारण यह है कि समिट तक पहुंचने में पर्वतारोही अपनी लगभग सारी ऊर्जा खर्च कर देते हैं और लौटते समय उन्हें बेहद कम ऑक्सीजन, भीषण ठंड, थकान और भीड़भाड़ का सामना करना पड़ता है. यही वजह है कि पर्वतारोहियों के बीच कहा जाता है- ‘एवरेस्ट की असली चढ़ाई शिखर के बाद शुरू होती है.’

By uttu

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