Thu. May 7th, 2026

 उच्च न्यायालय ने सबूतों के अभाव में ताड़मेटला नरसंहार के सभी आरोपितों को किया बरी

blank

रायपुर/बिलासपुर। छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग के सुकमा जिले के ताड़मेटला में 2010 को हुए भीषण नक्सली हमले के सभी आरोपितों को छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने बरी कर दिया है।

न्यायालय ने राज्य सरकार की अपील खारिज करते हुए निचली अदालत के बरी करने के फैसले को बरकरार रखा है। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय का यह आदेश पांच मई को दिया गया। अदालत ने इस फैसले को आज अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर सार्वजनिक किया।

चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने पाया कि जांच एजेंसियां आरोपितों के खिलाफ ठोस और कानूनी रूप से स्वीकार्य सबूत पेश करने में विफल रहीं। ट्रायल कोर्ट ने 2013 में ही सबूतों के अभाव में इन आरोपितों को बरी कर दिया था, जिसे अब उच्च न्यायालय ने भी बरकरार रखा है।

उच्च न्यायालय ने अपनी टिप्पणी में कहा कि यह बेहद दुखद है कि इतने बड़े नरसंहार और राष्ट्रीय सुरक्षा पर हमले के बावजूद, जांच एजेंसियां असली कातिलों को पकड़ने और उनके खिलाफ साक्ष्य जुटाने में नाकाम रहीं।

डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में कहा है कि, हमें यह देखकर बेहद दुख हुआ है। बड़े पैमाने पर जवान बलिदान हुए और राष्ट्रीय सुरक्षा को गंभीर परिणाम भुगतने पड़े।

इसके निपटारे में कोई भी कानूनी रूप से मान्य और विश्वसनीय साक्ष्य पेश नहीं किया जा सका। इसलिए निचली अदालत को उन्हें बरी करने के लिए विवश होना पड़ा।

जवानों पर हुए सामूहिक हमले के आरोपितों को प्रत्यक्ष साक्ष्यों की कमी, अपूर्ण परिस्थितिजन्य साक्ष्य, जांच में प्रक्रियात्मक खामियों और अपराध की गंभीरता के बावजूद उचित संदेह से परे दोष सिद्ध करने में विफलता के कारण बरी कर दिया गया।

कोर्ट द्वारा रेखांकित किया की पुलिस ने पकड़े गए आरोपितों की शिनाख्त परेड नहीं कराई। जांच एजेंसियों ने आर्म्स एक्टके तहत आवश्यक अभियोजन स्वीकृति का कोई रिकॉर्ड पेश नहीं किया।

अभियोजन पक्ष के अधिकांश गवाह जिनमें कई ग्रामीण और पुलिसकर्मी भी शामिल थे अदालत में अपनी बात से मुकर गए उन्होंने कोर्ट में कहा कि वे आरोपितों को नहीं पहचानते।

अदालत के अनुसार, आरोपितों से घातक हथियार या गोला-बारूद की जब्ती को कानूनी रूप से सिद्ध नहीं किया जा सका। आरोपितों के खिलाफ कोई भी प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं मिला जो उन्हें सीधे घटनास्थल पर हुई गोलीबारी या साजिश से जोड़ सके।

उच्च न्यायालय ने इस बात पर गहरा दुख जताया कि 76 जवानों के बलिदान जैसे गंभीर मामले में भी एजेंसियां कानूनी रूप से स्वीकार्य सबूत जुटाने में नाकाम रहीं, जिसके कारण असली दोषी अब भी कानून की पकड़ से बाहर हैं।

उल्लेखनीय है कि 7 जनवरी 2013 को दंतेवाड़ा की अतिरिक्त सत्र अदालत ने सबूतों के अभाव में सभी 10 आरोपितों को बरी कर दिया था। छत्तीसगढ़ सरकार ने 2014 में निचली अदालत के इस फैसले के खिलाफ उच्च न्यायालय में अपील दायर की थी।

 

By uttu

Related Post

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *