इन दिनों दिल्ली का जिमखाना खबरों में है. केंद्र सरकार ने 5 जून तक इसके परिसर को खाली करने का आदेश दिया है. 27.3 एकड़ की इसकी जमीन को रक्षा बुनियादी ढांचे के लिए जरूरी बताया है. इस फैसले के खिलाफ क्लब के सदस्यों ने अदालत में गुहार की है. यह क्लब 1913 में ‘इंपीरियल दिल्ली जिमखाना क्लब’ के रूप में शुरू हुआ था. अब इसकी उम्र करीब 113 साल है.
इस क्लब के सदस्यों की संख्या 5500 से 5600 के आसपास बतायी गई है. इस क्लब की सदस्यता की वेटिंग लंबी रहती है. यह क्लब दशकों से बहुत प्रभावशाली माना जाता है और इसकी सदस्यता मुश्किल से ही मिलती है.
तो जिमखाना का नाम जिमखाना कैसे पड़ा, इसकी भी रोचक कहानी है. अधिकांश भाषाविदों और इतिहासकारों का मानना है कि यह शब्द मूल रूप से फारसी और हिन्दी शब्द ‘गेंदखाना’ या जमातखाना से प्रभावित था. गेंदखाना का मतलब है वह जगह जहां गेंद के खेल खेले जाते हों और ‘जमातखाना’ का मतलब इकट्ठा होने की जगह से था. जब अंग्रेज भारत आए, तो वे इस शब्द का सही उच्चारण नहीं कर पाए. अपनी जीभ के अनुसार इसे ‘जिमखाना’ कहने लगे.
दिल्ली जिमखाना की प्रसिद्ध लाइब्रेरी (courtesy delhi gymkhana official website)
कुछ लोग इसे अंग्रेजी शब्द जिम्नेजियम यानि व्यायामशाला और हिन्दी शब्द खाना यानि जगह या घर का मेल मानते हैं. हालांकि शुरुआती दौर में जिमखाना में जिम या कसरत नहीं होती थी, बल्कि वहां टेनिस, घुड़सवारी, पोलो और अन्य मैदानी खेल होते थे. समय के साथ इस शब्द का अर्थ एक ऐसी जगह हो गया जहां खेल-कूद, सामाजिक मेलजोल और मनोरंजन की सुविधाएं एक साथ मौजूद हों.
ये भारत के हर प्रमुख शहर में क्यों
भारत के लगभग हर बड़े या पुराने शहर विशेषकर छावनी यानी कैंटोनमेंट क्षेत्रों और हिल स्टेशंस में जिमखाना क्लब होने के पीछे पूरी तरह से ब्रिटिश औपनिवेशिक इतिहास है. इसकी ये वजहें हैं
– अंग्रेजों के मनोरंजन और सामाजिक मेलजोल का केंद्र. ब्रिटिश अधिकारी, सैन्य कमांडर और उनके परिवार भारत के गर्म मौसम और अपने घर यानि ब्रिटेन से दूर रहने के कारण अकेलापन महसूस करते थे. उन्हें एक ऐसी जगह की जरूरत थी जहां वे शाम को इकट्ठा हो सकें, शराब पी सकें, ताश खेल सकें, गॉसिप कर सकें और अपने खेल जैसे टेनिस, पोलो, क्रिकेट, गोल्फ खेल सकें. इसलिए उन्होंने हर उस शहर में जिमखाना क्लब बनाए जहां ब्रिटिश आबादी या सेना की टुकड़ी तैनात थी.
दिल्ली जिमखाना का पुराना स्विमिंग पूल (courtesy delhi gymkhana official website)
जहां प्रशासनिक और सैन्य मुख्यालय थे. यानि सिविल लाइन्स और कैंट इलाके. अंग्रेजों ने भारत के शासन को चलाने के लिए देश को अलग-अलग जिलों और संभागों में बांटा था. हर प्रमुख शहर में एक ‘सिविल लाइन्स’ या ‘कैंटोनमेंट’ इलाका होता था, जहां अंग्रेज अफसर रहते थे. इन इलाकों का एक अनिवार्य हिस्सा ‘जिमखाना क्लब’ होता था. जैसे-जैसे ब्रिटिश साम्राज्य फैला, हर प्रमुख शहर में जिमखाना खुलता गया.
भारतीयों के लिए ‘स्टेटस सिंबल’
शुरुआत में, इन क्लबों के बाहर बोर्ड लगा होता था, “डॉग्स एंड इंडियंस नाट अलाउड” यानि कुत्तों और भारतीयों का प्रवेश वर्जित है. बाद में, जब भारत के राजा-महाराजाओं, नवाबों और अमीर उद्योगपतियों ने अंग्रेजों के साथ व्यापार और संबंध बढ़ाए तो उन्हें भी कुछ क्लबों में एंट्री मिलने लगी. आजादी के बाद, इन क्लबों की कमान भारतीय सेना, नौकरशाहों और शहर के संभ्रांत नागरिकों के हाथ में आ गई.
दिल्ली जिमखाना के टेनिस कोर्ट, इस प्रसिद्ध टेनिस कोर्ट पर कई इंटरनेशनल मैच भी हो चुके हैं. (courtesy delhi gymkhana official website)
आज के समय में जिमखाना की स्थिति
आज भी भारत के प्रमुख शहरों के जिमखाना क्लब जैसे बॉम्बे जिमखाना, दिल्ली जिमखाना, मद्रास जिमखाना अपनी प्रीमियम लाइफस्टाइल, औपनिवेशिक वास्तुकला और बेहद कड़े मेंबरशिप नियमों के लिए जाने जाते हैं. हर जगह मेंबर बनने के लिए लंबी वेटिंगलिस्ट है. ये क्लब आज भी शहर के रसूखदार लोगों, अफसरों और बिजनेसमैन के लिए नेटवर्किंग और खेल-कूद का एक बड़ा केंद्र बने हुए हैं.
जब महात्मा गांधी ने ‘बॉम्बे जिमखाना’ का बहिष्कार कराया
यह किस्सा 1930 के दशक का है, जब भारत में ब्रिटिश शासन के खिलाफ ‘सविनय अवज्ञा आंदोलन’ चल रहा था. उस दौर में बॉम्बे जिमखाना में यूरोपीय और भारतीय क्रिकेटरों के बीच मशहूर ‘क्वाड्रांगुलर क्रिकेट टूर्नामेंट’ खेला जाता था. यह मुंबई का सबसे बड़ा खेल आयोजन था.
महात्मा गांधी ने देश के लोगों और हिंदू जिमखाना के हिंदू क्रिकेटरों से अपील की कि जब देश आजादी की लड़ाई लड़ रहा है, तो उन्हें अंग्रेजों के मनोरंजन का हिस्सा नहीं बनना चाहिए. गांधीजी की अपील का ऐसा असर हुआ कि प्रमुख भारतीय खिलाड़ियों ने मैच खेलने से मना कर दिया, जिससे अंग्रेजों का यह प्रतिष्ठित टूर्नामेंट पूरी तरह ठप हो गया.
दिल्ली जिमखाना (courtesy delhi gymkhana official website)
महाराजा भूपिंदर सिंह का बदला
पटियाला के महाराजा भूपिंदर सिंह अपने दौर के सबसे आलीशान और स्वाभिमानी राजाओं में एक थे. एक बार वे शिमला के सेसिल होटल और वहां के ब्रिटिश जिमखाना क्लब में गए. वहां अंग्रेजों ने उनके साथ रंगभेद किया. उन्हें क्लब के मुख्य हिस्से में जाने से रोक दिया, क्योंकि तब कई क्लबों में भारतीयों का प्रवेश प्रतिबंधित था.
महाराजा को यह अपमान बर्दाश्त नहीं हुआ. उन्होंने अंग्रेजों को सबक सिखाने के लिए शिमला से भी ऊंची चोटी पर स्थित चैल नाम की जगह को अपनी ग्रीष्मकालीन राजधानी बना लिया. वहां उन्होंने अंग्रेजों के क्लब से भी शानदार महल बनवाया. दुनिया का सबसे ऊंचा क्रिकेट मैदान तैयार करवा दिया, ताकि अंग्रेजों का घमंड तोड़ा जा सके.
नेहरू को जब ब्रिटिश वेटर ने सूप परोसा
नई दिल्ली का ‘दिल्ली जिमखाना क्लब’ लुटियंस दिल्ली के बीच में है. इसे सत्ता का सबसे बड़ा गलियारा माना जाता था. आजादी के ठीक बाद, क्लब का प्रबंधन अंग्रेजों से भारतीयों के हाथ में आ रहा था. एक बार भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू क्लब में लंच के लिए गए.
दिल्ली जिमखाना (courtesy delhi gymkhana official website)
वहां के एक पुराने ब्रिटिश वेटर ने नेहरू जी को सूप सर्व करते समय गलती से कुछ बूंदें उनकी अचकन पर गिरा दीं. नेहरू जी स्वभाव से थोड़े तेज थे, लेकिन उन्होंने उस वेटर पर गुस्सा करने के बजाय मुस्कुराकर कहा, “कोई बात नहीं, कम से कम तुम्हारी सर्विस आज भी उतनी ही तेज है जितनी ब्रिटिश राज में थी.” यह किस्सा सालों तक क्लब के गलियारों में सुनाया जाता रहा कि कैसे नए भारत के नेता पुरानी औपनिवेशिक गलतियों को बड़प्पन से माफ कर देते थे.
‘मद्रास जिमखाना’ और दक्षिण भारत की पहली कार
मद्रास जिमखाना क्लब का इतिहास बेहद अनोखा है. ये भारत के सबसे पुराने क्लबों में से एक है. इसकी स्थापना 1884 में हुई थी. साल 1894 में मद्रास के एक मशहूर वकील और बिजनेसमैन ए.जे. बंपस ने दक्षिण भारत की सबसे पहली ‘भाप से चलने वाली कार’ खरीदी थी.
उस दौर में शहर की सड़कों पर कार चलाने की अनुमति नहीं थी. तब बंपस ने अपनी कार का पहला ट्रायल रन मद्रास जिमखाना क्लब के मैदान पर ही किया. उस दिन क्लब के सभी अंग्रेज और भारतीय सदस्य इस अजूबे को देखने के लिए इकट्ठा हुए थे. यह क्लब दक्षिण भारत में आधुनिक जीवनशैली की शुरुआत का गवाह बना.
जब जाम तो टकराए, लेकिन गम में!
14 अगस्त 1947 की रात को जब पूरा देश आजादी के जश्न में डूबने की तैयारी कर रहा था, तब भारत के कई जिमखाना क्लबों जैसे कलकत्ता जिमखाना और दिल्ली जिमखाना का माहौल बिल्कुल अलग था.
वहां मौजूद ब्रिटिश सिविल सर्वेंट्स और सेना के अफसर भावुक थे. कई क्लबों के रिकॉर्ड्स में दर्ज है कि उस रात अंग्रेजों ने भारत में अपनी आखिरी शाम मनाते हुए एक पारंपरिक विदाई गीत गाया.
आधी रात को जैसे ही यूनियन जैक उतरा और तिरंगा लहराया, कई अंग्रेज अफसरों ने रोते हुए अपने भारतीय सहयोगियों को क्लब की चाबियां और वाइन सेलर की जिम्मेदारी सौंपी.
