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पश्चिम एशिया संकट:ईरान ने दी लाल सागर ठप करने की धमकी, अमेरिका का पैगाम लेकर तेहरान पहुंचा पाकिस्तान – Iran Pakistan Meeting Us Talks Decision Lebanon Ceasefire Update

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पश्चिम एशिया में जारी तनाव अब ऐसे मोड़ पर पहुंच गया है, जहां से दुनिया या तो महाविनाश की ओर जाएगी या फिर एक ऐतिहासिक शांति समझौते की ओर। बुधवार को ईरान की सेना ने सीधी चेतावनी देते हुए कहा है कि अगर अमेरिका ने ईरानी बंदरगाहों की नौसैनिक घेराबंदी खत्म नहीं की, तो वह ‘लाल सागर’ के तमाम व्यापारिक रास्तों को पूरी तरह बंद कर देगा। ईरान का कहना है कि इस तनाव के बीच मौजूदा युद्धविराम अब खतरे में है।

शांति की आखिरी कोशिश, पाकिस्तान बना दूत

जंग को रोकने के लिए कूटनीतिक गलियारों में हलचल तेज है। अमेरिका से एक नया संदेश लेकर पाकिस्तान का एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल तेहरान पहुंचा है। यह शांति की दूसरी बड़ी कोशिश है, क्योंकि पहली कोशिश नाकाम रही थी। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिए हैं कि दोनों देशों के बीच बातचीत इसी हफ्ते दोबारा शुरू हो सकती है।

क्या है ‘ग्रैंड बार्गेन’ डील?

अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस पिछले हफ्ते की विफल रही वार्ता का नेतृत्व कर रहे थे। वेंस के अनुसार, ईरान को एक ‘ग्रैंड बार्गेन’ यानी महासौदा का प्रस्ताव दिया गया है। इसके तहत पिछले छह हफ्तों से जारी युद्ध को समाप्त करने और तेहरान के दशकों पुराने परमाणु कार्यक्रम विवाद को सुलझाने की योजना है। 

हालांकि, इस बीच ईरानी समाचार एजेंसी तसनीम ने रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (आईआरजीसी) के हवाले से कहा है कि ईरान अमेरिका के साथ अगले दौर की बातचीत पर अपना अंतिम फैसला आज पाकिस्तान के प्रतिनिधिमंडल के साथ होने वाली बैठक के बाद लेगा। बताया गया है कि ईरान फिलहाल ‘वेट एंड वॉच’ की स्थिति में है। उसकी नजरें न केवल पाकिस्तान के साथ हो रही इस अहम मुलाकात पर हैं, बल्कि वह लेबनान में इस्राइल और अमेरिका के बीच संभावित युद्धविराम समझौते को भी बहुत गौर से देख रहा है।

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मध्यस्थ नहीं, महज ‘फैसिलिटेटर’ की भूमिका में रहा पाकिस्तान

बता दें कि इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच हुई वार्ता से अपेक्षित परिणाम नहीं निकल सके हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि फारस की खाड़ी में स्थायी और न्यायपूर्ण शांति के लिए इस प्रक्रिया को अब अन्य माध्यमों से आगे बढ़ाने की आवश्यकता है। ‘पोलिटिया रिसर्च फाउंडेशन’ में प्रकाशित एक लेख के अनुसार, शांति प्रक्रिया में पाकिस्तान की भूमिका एक सक्रिय ‘मध्यस्थ’ के बजाय केवल एक ‘फैसिलिटेटर’ की रही। रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि जहां एक मध्यस्थ दोनों पक्षों को साझा समाधान की ओर ले जाने के लिए सक्रिय भूमिका नि भाता है, वहीं एक फैसिलिटेटर केवल दोनों पक्षों के बीच संदेशों और जानकारियों के आदान-प्रदान का माध्यम बनता है।

रिपोर्ट के लेखक संजय पुलिपाका ने कहा कि 28 फरवरी 2026 से शुरू हुए इस संघर्ष ने वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गहरा असर डाला है। विशेषकर होर्मुज जलडमरूमध्य में आपूर्ति बाधित होने से भारत समेत कई देशों को ऊर्जा संकट का सामना करना पड़ा। लेख के अनुसार, भारत को ‘प्राथमिक मध्यस्थ’ के रूप में न चुने जाने का एक बड़ा कारण इसकी सक्रिय कूटनीति है। यदि भारत मध्यस्थ होता, तो वह समुद्री मार्गों को खुला रखने के लिए कड़ा हस्तक्षेप करता।

By uttu

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