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आतंकी के पास था ऐसा डिजिटल हथियार, ना चाहिए थे सिग्नल, न हो सकती थी ट्रैकिंग
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22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम की खूबसूरत बैसरन घाटी अचानक गोलियों और चीखों से कांप उठी. पर्यटकों पर हुए इस आतंकी हमले ने पूरे देश को झकझोर दिया था. शुरुआती जांच में मामला सिर्फ बंदूक और घुसपैठ तक सीमित लग रहा था. लेकिन, जैसे-जैसे परतें खुलीं, सुरक्षा एजेंसियों के सामने आतंक का एक नया और खतरनाक चेहरा सामने था. पता चला कि आतंकियों ने जंगलों, पहाड़ों और बिना नेटवर्क वाले इलाकों में रास्ता ढूंढने के लिए आधुनिक डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल किया था. यही वह सच है, जिसे भारतीय सेना के अधिकारी नैमिष अपनी पत्नी दीपना को समझाने की कोशिश कर रहा है.

सन्नाटे में छिपा डर: दिल्ली की ठंडी शाम थी. बरामदे में हल्की हवा चल रही थी, लेकिन नैमिष के चेहरे पर बेचैनी साफ दिख रही थी. वह दीवार की तरफ देखता हुआ किसी गहरी सोच में डूबा था. तभी दीपना दो कप चाय लेकर आई. उसने महसूस कर लिया कि पहलगाम की खबर ने नैमिष को अंदर तक हिला दिया है.
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