भीलवाड़ा. खेती में लगातार बढ़ती लागत ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है. खासतौर पर रासायनिक खाद और कीटनाशकों की महंगी कीमतों के कारण अब किसान वैकल्पिक तरीकों की तलाश कर रहे हैं. ऐसे में जैविक खेती की तरफ किसानों का रुझान तेजी से बढ़ रहा है. जैविक खेती में इस्तेमाल होने वाला दशपर्णी अर्क अब किसानों के लिए सस्ता और असरदार विकल्प बनता जा रहा है. भीलवाड़ा कृषि विभाग भी किसानों को इसके उपयोग के लिए लगातार जागरूक कर रहा है.
दशपर्णी अर्क एक देसी जैविक घोल है, जिसे खेत और घर पर आसानी से तैयार किया जा सकता है. इसकी खास बात यह है कि इसमें नीम, धतूरा, आक, करंज और कई अन्य कड़वी पत्तियों का उपयोग किया जाता है. यह घोल फसलों को प्राकृतिक रूप से मजबूत बनाने में मदद करता है. साथ ही मिट्टी की गुणवत्ता को नुकसान पहुंचाए बिना उत्पादन बढ़ाने में भी सहायक माना जाता है. इसकी एक बड़ी खासियत यह भी है कि यह घोल करीब तीन महीने तक खराब नहीं होता. जिन पत्तियों को गाय और बकरी भी नहीं खातीं, उनका उपयोग भी इसमें किया जा सकता है.
दस तरह की पत्तियों से तैयार होता है यह जैविक घोल
भीलवाड़ा जिले के आसींद क्षेत्र के रहने वाले भैरू लाल बताते हैं कि दशपर्णी अर्क मुख्य रूप से दस प्रकार की पत्तियों से तैयार किया जाता है. इसमें नीम, धतूरा, आक, करंज, पपीता, अमरूद, अरंडी और अन्य कड़वी पत्तियों का उपयोग किया जाता है. किसान इन पत्तियों को बारीक काटकर बड़े ड्रम में डालते हैं. इसके बाद उसमें गोमूत्र, गोबर और पानी मिलाया जाता है.
इस मिश्रण को करीब 30 से 40 दिनों तक ढककर रखा जाता है. बीच-बीच में इसे लकड़ी से हिलाया जाता है ताकि सभी तत्व अच्छी तरह मिल सकें. धीरे-धीरे यह मिश्रण तैयार होकर जैविक खाद और कीटनाशक का रूप ले लेता है. बाद में इसे छानकर पानी में मिलाया जाता है और फसलों पर छिड़काव किया जाता है.
फसलों को कीटों से बचाने में करता है मदद
दशपर्णी अर्क का उपयोग सब्जियों, अनाज, दलहन और बागवानी फसलों में आसानी से किया जा सकता है. यह फसलों में लगने वाले कई तरह के कीटों को नियंत्रित करने में मदद करता है. खासतौर पर रस चूसने वाले कीट, इल्ली और पत्तियों को नुकसान पहुंचाने वाले कीड़ों पर इसका अच्छा असर देखने को मिलता है.
किसानों का कहना है कि इसके नियमित उपयोग से फसल की बढ़वार बेहतर होती है और पौधे ज्यादा मजबूत बनते हैं. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इससे मिट्टी की उर्वरता लंबे समय तक बनी रहती है. जहां रासायनिक दवाओं के लगातार उपयोग से जमीन की ताकत कम हो रही है, वहीं यह जैविक घोल मिट्टी को नुकसान नहीं पहुंचाता.
कम लागत में किसानों को मिल रहा बेहतर विकल्प
दशपर्णी अर्क की सबसे बड़ी खासियत इसकी कम लागत है. किसान इसे अपने खेतों में उपलब्ध सामग्री से तैयार कर सकते हैं. इससे बाजार से महंगी दवाइयां खरीदने की जरूरत काफी कम हो जाती है. छोटे और सीमांत किसानों के लिए यह तरीका काफी फायदेमंद साबित हो रहा है.
अब कई किसान धीरे-धीरे रासायनिक खेती छोड़कर जैविक खेती की ओर बढ़ रहे हैं. जैविक तरीके से तैयार फसलों की बाजार में मांग भी लगातार बढ़ रही है, जिससे किसानों को बेहतर दाम मिलने की संभावना रहती है. कृषि विभाग और कृषि वैज्ञानिक भी किसानों को जैविक खेती अपनाने के लिए लगातार प्रेरित कर रहे हैं. गांवों में कई किसान खुद यह घोल तैयार कर रहे हैं और दूसरे किसानों को भी इसकी जानकारी दे रहे हैं.
