दरअसल, भारत अपनी सैन्य क्षमता को नई ऊंचाइयों तक ले जाने की दिशा में एक बेहद एडवांस और स्ट्रैटजिक प्रोजेक्ट पर चुपचाप काम कर रहा है. यह परियोजना देश के भीतर 80 से 100 मीटर या उससे अधिक गहराई में बनाए जा रहे अल्ट्रा-डीप सैन्य गुफाओं (कवर्न्स) से जुड़ी है, जिन्हें आधुनिक युद्ध के सबसे शक्तिशाली हथियारों से भी सुरक्षित रखने के लिए डिजाइन किया गया है. ये पारंपरिक बंकर नहीं, बल्कि कठोर चट्टानों (जैसे ग्रेनाइट और बेसाल्ट) के भीतर बनाए गए अत्याधुनिक सैन्य किले हैं. इन्हें भेद पाना नामुमकिन के करीब है. इन गुफाओं की सबसे बड़ी खासियत है जियोलॉजिकल शील्डिंग यानी प्राकृतिक चट्टानों की मजबूती का उपयोग. जहां आमतौर पर सैन्य बंकर मजबूत कंक्रीट पर निर्भर होते हैं, वहीं भारत ने पहाड़ों की प्राकृतिक संरचना (Natural Formation) को अपनी रक्षा का आधार बनाया है. उदाहरण के लिए अमेरिका का 12,000 किलोग्राम क्लास का GBU-57B बंकर बस्टर बम करीब 60 मीटर मिट्टी या 20 मीटर कंक्रीट को भेद सकता है. लेकिन भारतीय कवर्न्स को इससे कहीं अधिक गहराई पर बनाया जा रहा है, जिससे ये हमले जीरो पॉइंट तक पहुंच ही नहीं पाते.
दुनिया के तमाम देश अपने क्रिटिकल मिलिट्री इंफ्रास्ट्रक्चर को सुरक्षित रखने के लिए अंडरग्राउंड बंकर बनाते हैं. (फाइल फोटो/Reuters)
डिफ्लेक्शन लेयर
‘इंडियन डिफेंस रिसर्च विंग’ की रिपोर्ट के अनुसार, इन संरचनाओं में एक और महत्वपूर्ण तकनीकी इनोवेशन डिफ्लेक्शन लेयर या बलिदानी परत है. यह विशेष परत हाई क्वालिटी वाले कंक्रीट और मलबे से बनी होती है, जिसका उद्देश्य आने वाले बम या मिसाइल की दिशा को अस्थिर करना होता है. जब कोई बंकर बस्टर इस परत से टकराता है, तो उसका मार्ग बदल जाता है और वह मेन स्ट्रक्चर से दूर विस्फोट करता है. इस तरह ये गुफाएं केवल निष्क्रिय सुरक्षा नहीं देतीं, बल्कि सक्रिय रूप से हमलों को निष्प्रभावी करती हैं. रणनीतिक दृष्टि से भी इन गुफाओं का महत्व बेहद अहम है. इन्हें भारत की लंबी दूरी की मिसाइल प्रणालियों के लिए सुरक्षित लॉन्च बेस के रूप में विकसित किया जा रहा है. अग्नि मिसाइल सीरीज और प्रलय मिसाइल जैसे सिस्टम इन गुफाओं में छिपे रह सकते हैं. ट्रांसपोर्टर इरेक्टर लॉन्चर (TEL) वाहनों के जरिए ये मिसाइलें तेजी से बाहर आकर हमला कर सकती हैं और फिर तुरंत वापस गुफाओं में लौट सकती हैं. इस शूट-एंड-स्कूट क्षमता से दुश्मन के लिए इनकी लोकेशन ट्रैक करना बेहद कठिन हो जाता है. इसके अलावा ये विशेष गुफानुमा बंकर पर्यावरणीय स्थिरता भी प्रदान करती हैं. नेशनल हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर कॉरपोरेशन जैसे संस्थानों की विशेषज्ञता का उपयोग करते हुए इन सुविधाओं में तापमान को नियंत्रित रखा जाता है. यह मिसाइलों के सॉलिड रॉकेट मोटर्स, इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम और अन्य संवेदनशील उपकरणों की दीर्घकालिक सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी है. इससे रखरखाव की लागत भी कम होती है और हथियारों की विश्वसनीयता बढ़ती है.
बंकर बस्टर बम क्या होता है?
बंकर बस्टर बम एक खास तरह का शक्तिशाली बम होता है, जिसे जमीन के भीतर गहराई में बने ठिकानों, सुरंगों और मजबूत कंक्रीट बंकरों को नष्ट करने के लिए डिजाइन किया जाता है. सामान्य बम सतह पर विस्फोट करते हैं, जबकि बंकर बस्टर पहले जमीन या कंक्रीट को भेदता है और फिर अंदर जाकर धमाका करता है.
यह बम कैसे काम करता है?
इस बम की बाहरी संरचना बेहद मजबूत स्टील या मिश्र धातु से बनी होती है, जिससे यह जमीन या कंक्रीट की मोटी परतों को चीर सकता है. जब इसे गिराया जाता है, तो यह तेज गति से लक्ष्य को भेदते हुए अंदर पहुंचता है और फिर देरी से विस्फोट (Delayed Detonation) होता है. इससे अंदर छिपे ठिकाने पूरी तरह तबाह हो जाते हैं.
बंकर बस्टर बम की जरूरत क्यों पड़ती है?
आधुनिक युद्ध में कई देश अपने महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों, हथियार भंडार और कमांड सेंटर को जमीन के नीचे गहराई में बनाते हैं. ऐसे ठिकानों को सामान्य बमों से नष्ट करना मुश्किल होता है. इसलिए बंकर बस्टर बम का उपयोग किया जाता है ताकि दुश्मन की छिपी हुई सैन्य क्षमता को खत्म किया जा सके.
क्या यह बम परमाणु भी हो सकता है?
बंकर बस्टर बम दो तरह के हो सकते हैं—पारंपरिक (Conventional) और परमाणु (Nuclear). ज्यादातर उपयोग पारंपरिक बंकर बस्टर का ही होता है, लेकिन कुछ देशों ने ऐसे परमाणु बंकर बस्टर भी विकसित किए हैं, जो अत्यधिक विनाशकारी होते हैं. हालांकि इनका इस्तेमाल बेहद संवेदनशील और विवादास्पद माना जाता है.
दुनिया में किन-किन देशों के पास यह तकनीक है?
अमेरिका, रूस, चीन और कुछ अन्य सैन्य रूप से शक्तिशाली देशों के पास उन्नत बंकर बस्टर तकनीक मौजूद है. ये बम अत्याधुनिक गाइडेंस सिस्टम से लैस होते हैं, जिससे इन्हें बेहद सटीक तरीके से लक्ष्य पर गिराया जा सकता है. बंकर बस्टर बम आधुनिक युद्ध का एक अहम हथियार बन चुका है, जो दुश्मन के सबसे सुरक्षित ठिकानों को भी निशाना बनाने में सक्षम है. इसकी ताकत और सटीकता इसे रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण बनाती है.
12 हजार किलोग्राम कैटेगरी वाला GBU-57B मैसिव ऑर्डनेंस पेनेट्रेटर भी भारत के अंडरग्राउंड फैसिलिटी का कुछ नहीं बिगाड़ सकेंगे. (फाइल फोटो/Reuters)
चीन सीमा पर विशेष फोकस
भौगोलिक रूप से यह परियोजना देश के कई रणनीतिक क्षेत्रों में फैली हुई है. लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश जैसे उत्तरी सीमावर्ती इलाकों में फॉर्मेशन एम्युनिशन स्टोरेज फैसिलिटी (FASF) विकसित की जा रही हैं, जिससे अग्रिम मोर्चे पर तैनात सैनिकों को मिनटों में गोला-बारूद उपलब्ध हो सके. इससे पहले जहां आपूर्ति में लंबा समय लगता था, अब यह प्रक्रिया बेहद तेज और प्रभावी हो जाएगी. वहीं, पूर्वी और पश्चिमी घाट जैसे प्रायद्वीपीय क्षेत्रों में भी गहरी गुफाओं का निर्माण किया जा रहा है. ये नेवी और रणनीतिक बलों (Strategic Forces ) के लिए सुरक्षित केंद्र के रूप में काम करेंगी. ये सुविधाएं समुद्र से लॉन्च होने वाली क्रूज मिसाइलों के हमलों से भी सुरक्षित रहने के लिए तैयार की जा रही हैं. दिलचस्प बात यह है कि भारत केवल रक्षात्मक ढांचे पर ही काम नहीं कर रहा, बल्कि समान रूप से आक्रामक क्षमताओं को भी विकसित कर रहा है. रिपोर्ट्स के अनुसार, अग्नि-V का एक बंकर बस्टर वेरिएंट विकसित किया जा रहा है, जिसमें 7,500 से 8,000 किलोग्राम के हाई-डेन्सिटी वाले पेनेट्रेटर वॉरहेड का उपयोग हो सकता है. यह मिसाइल हाइपरसोनिक गति (मैक 8 से अधिक) से टकराकर दुश्मन के भूमिगत ठिकानों को निशाना बना सकती है.
दोहरी रणनीति
इस तरह भारत की रणनीति दोहरी दिशा में आगे बढ़ रही है – एक तरफ अपने महत्वपूर्ण सैन्य संसाधनों को अभेद्य बनाना और दूसरी तरफ दुश्मन के ऐसे ही ठिकानों को नष्ट करने की क्षमता विकसित करना. यह संतुलन भारत की रक्षा नीति में एक बड़े बदलाव का संकेत है, जहां केवल हथियारों की संख्या नहीं, बल्कि उनकी सुरक्षा, गतिशीलता और जवाबी क्षमता पर भी बराबर ध्यान दिया जा रहा है. ये अल्ट्रा-डीप सैन्य गुफाएं भारत की उभरती हुई सैन्य ताकत और उसकी दीर्घकालिक रणनीतिक सोच का प्रतीक हैं. आने वाले समय में यह ढांचा देश की सुरक्षा और प्रतिरोधक क्षमता (डेटरेंस) को और मजबूत करेगा, जिससे भारत वैश्विक स्तर पर एक अधिक सक्षम और सुरक्षित सैन्य शक्ति के रूप में उभरेगा.
