नई दिल्ली: पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी इस समय तीन बड़े राज्यों में हॉट टॉपिक बना हुआ है. उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और केरल पांचो राज्यों में ओबीसी अलग-अलग वजहों से चर्चा में है. उत्तर भारत के राज्यों में ओबीसी राजनीति के हिसाब से भी काफी विषय है. तमाम राजनीतिक पार्टियां ओबीसी को केंद्र में रखकर राजनीति करती हैं. आइए पहले बारी-बारी से समझने की कोशिश करते हैं कि ये पांचों बड़े राज्यों में ओबीसी का विषय चर्चा में क्यों है ?
विधानसभा चुनाव से ठीक पहले यूपी में पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन
उत्तर प्रदेश में अगले साल की शुरुआत में विधानसभा चुनाव होने हैं. उससे पहले मई-जून में पंचायत चुनाव होने हैं. हालांकि एसआईआर के बाद वोटर लिस्ट के प्रकाशन में देरी और ओबीसी आरक्षण में स्पष्टता नहीं होने के चलते यूपी में पंचायत चुनाव की तारीख टलनी तय मानी जा रही है. पंचायत चुनाव से ठीक पहले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पंचायत चुनाव में ओबीसी आरक्षण तय करने के लिए नया आयोग गठन करने का आदेश दे दिया है. कैबिनेट बैठक में प्रस्ताव पारित होने के बाद ओबीसी आरक्षण तय करने के लिए यूपी सरकार ने पिछड़ा वर्ग आयोग गठन को मंजूरी दे दी है. इस आयोग को ओबीसी आरक्षण के मसले को सुलझाने का जिम्मा सौंपा गया है. इस आयोग के सर्वे रिपोर्ट को आधार मानकर ही सीटों के आरक्षण का रोटेशन तय होगा. इससे सुप्रीम कोर्ट के ट्रिपल टेस्ट फॉर्मूले की वैधानिक बाध्यता भी पूरी हो जाएगी. पांच सदस्यीय ओबीसी आयोग के प्रमुख हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज होंगे. इन्हें छह महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपनी होगी.
पश्चिम बंगाल में ओबीसी आरक्षण से मुस्लिम हुए बाहर
पश्चिम बंगाल में पहली बार सरकार चला रही बीजेपी ने धर्म आधारित वर्गीकरण योजनाओं को बंद कर दिया. यानी ममता बनर्जी ने मुस्लिमों को ओबीसी कैटेगरी में शामिल करके जो आरक्षण दिया था, उसे खत्म कर दिया गया है. 2010 से पहले राज्य की ओबीसी आरक्षण सूची में शामिल 66 समुदायों को नियमित कर दिया, जिससे सात फीसदी कोटे के लिए उनकी पात्रता बहाल हो गई. मई 2024 के कलकत्ता हाई कोर्ट के एक फैसले को आधार बनाकर मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने यह फैसला लिया है. हाई कोर्ट के फैसले में 2010 और 2012 के बीच जोड़े गए 77 अतिरिक्त समुदायों को जारी किए गए ओबीसी दर्जे और प्रमाण पत्रों को रद्द कर दिया गया था.
राज्य के पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग की ओर से जारी अधिसूचना में कहा गया है कि एक ही श्रेणी में रखे गए ये समुदाय (जिनमें से तीन मुस्लिम समुदाय हैं) अब सरकारी सेवाओं में सात प्रतिशत आरक्षण के पात्र होंगे. वर्तमान नियमितीकरण ने पिछली प्रणाली का स्थान ले लिया है, जिसमें ‘अधिक पिछड़ा’ के रूप में पहचाने जाने वाले वर्ग ‘ए’ के तहत 10 प्रतिशत और ‘पिछड़ा’ के रूप में पहचाने जाने वाले वर्ग ‘बी’ के तहत सात प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान था. ओबीसी सूची में कपाली, कुर्मी, सुद्रधर, कर्मकार, सूत्रधार, स्वर्णकार, नापित, तांती, धानुक, कसाई, खंडैत, तुरहा, देवंगा और गोला जैसे कई पारंपरिक एवं सामाजिक समुदाय शामिल हैं. इस सूची में शामिल तीन मुस्लिम समुदाय पहाड़िया, हज्जाम और चौदुली हैं.
महाराष्ट्र में ओबीसी की क्रीमी लेयर सीमा 8 से 15 लाख करने की सिफारिश
उधर, महाराष्ट्र सरकार ने ओबीसी वर्ग को बड़ी राहत देने की तैयारी शुरू कर दी है. राज्य की ओबीसी कैबिनेट उप-समिति ने गैर-क्रीमी लेयर की वार्षिक आय सीमा को 8 लाख रुपये से बढ़ाकर 15 लाख रुपये करने की सिफारिश की है. इस प्रस्ताव पर जल्द ही मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के साथ बैठक में अंतिम चर्चा होगी.
समिति के अध्यक्ष और राजस्व मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले ने बताया कि 43 नई जातियों को केंद्रीय ओबीसी सूची में शामिल करने का प्रस्ताव पहले ही राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (एनसीबीसी) को भेजा जा चुका है. इस फैसले से राज्य के लाखों ओबीसी परिवारों को लाभ मिलने की उम्मीद है.
मध्य प्रदेश में हाई कोर्ट में लटका है ओबीसी आरक्षण
साल 2019 में कांग्रेस की कमलनाथ की सरकार ने मध्य प्रदेश में ओबीसी आरक्षण 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने का फैसला किया था. सरकार का तर्क था कि राज्य में ओबीसी आबादी करीब 48 प्रतिशत है, इसलिए उन्हें अधिक आरक्षण मिलना चाहिए. लेकिन इस फैसले को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में चुनौती दी गई. याचिकाकर्ताओं ने कहा कि इससे राज्य में कुल आरक्षण 50 प्रतिशत की संवैधानिक सीमा से ऊपर चला जाएगा, जो 1992 के इंदिरा साहनी जजमेंट के फैसले के खिलाफ है. मई 2020 में हाईकोर्ट ने 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण पर अंतरिम रोक लगा दी, जिसके कारण राज्य की कई सरकारी भर्तियां प्रभावित हुईं. फिलहाल यह मामला हाईकोर्ट में विचाराधीन है. इस वजह से मध्य प्रदेश में पंचायत चुनाव भी अटके हुए हैं.
केरल में भी ओबीसी के लिए बीजेपी ने तैयार किया एजेंडा
केरल विधानसभा चुनाव में तीन सीटें जीतने के बाद बीजेपी ने राज्य में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए 13 सूत्रीय राजनीतिक एजेंडा तैयार किया है. इस रणनीति का मुख्य फोकस हिंदू पिछड़े समुदायों, खासकर ओबीसी वर्ग, के बीच समर्थन बढ़ाने पर है. पार्टी ने साफ कहा है कि ओबीसी आरक्षण के नाम पर धार्मिक आधार पर आरक्षण नहीं दिया जाना चाहिए. बीजेपी अल्पसंख्यक समुदायों, विशेषकर ईसाइयों, से संपर्क बनाए रखने की बात भी कर रही है, हालांकि चर्च नेतृत्व के साथ संस्थागत स्तर पर दूरी बढ़ी है. एजेंडे में शबरिमला मुद्दा, मंदिर संपत्तियों के ऑडिट और समान अवसर जैसे मुद्दों को भी शामिल किया गया है. भाजपा का मानना है कि यह रणनीति आगामी लोकसभा चुनाव से पहले राज्य में उसके जनाधार को मजबूत करेगी.
ओबीसी को लेकर इतनी बातें क्यों?
भारतीय जनता पार्टी आमतौर पर जाति के बजाय हिंदू धर्म के मुद्दे पर बात करती रही है. 2024 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस के राहुल गांधी ने जातीय जनगणना के मुद्दे को हवा देनी शुरू की. बिहार से तेजस्वी यादव, यूपी से अखिलेश यादव, तमिलनाडु से एमके स्टालिन सरीखे नेता भी इस मुद्दे पर राहुल गांधी का साथ देते दिखे. 2024 के लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान राहुल गांधी ओबीसी और दलितों को उनकी वास्तविक हिस्सेदारी की मांग करते दिखे. उनके इस स्टैंड का ना केवल उनकी पार्टी को बल्कि पूरे इंडिया गठबंधन को फायदा हुआ. लोकसभा में कांग्रेस 99, समाजवादी पार्टी 37 और डीएमके 24 सीटें जीतने में सफल रही. 2024 लोकसभा चुनाव में मिली सफलता से उत्साहित राहुल गांधी तब से लगातार हर चुनाव और हर भाषण में ओबीसी और दलितों को वास्तविक हिस्सेदारी देने की मांग करते देखे जाते हैं.
2024 के लोकसभा चुनाव में लगे झटके के बाद बीजेपी हमेशा की तरह कोर्स करेक्शन करती दिख रही है. विधानसभा चुनाव से ठीक पहले ओबीसी आरक्षण के लिए कमेटी के गठन के फैसले को मास्टरस्ट्रोक माना जा रहा है. इसके साथ ही ओबीसी समाज को अपने साथ जोड़े रखने के लिए बीजेपी ने ओबीसी समाज से आने वाले पंकज चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष बनाया है. आगामी उत्तर प्रदेश चुनाव में कमोबेश ओबीसी की राजनीति करने वाली समाजवादी पार्टी से बीजेपी का मुकाबला है. दूसरी तरफ पश्चिम बंगाल में ओबीसी कैटेगरी से मुस्लिमों को बाहर करके बीजेपी ने हिंदू समाज को एक अलग मैसेज दिया है. ऐसे में बीजेपी अलग-अलग राज्यों में हर वो कदम उठा रही है जिससे वह ओबीसी की हितैषी नजर आए. बीजेपी भली-भांति समझती है कि ओबीसी जातियां अगर खुश रहती हैं तो उन्हें पहले 2027 का यूपी चुनाव फिर 2029 का आम चुनाव जीतने से कोई नहीं रोक सकता है.
