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OPINION: भारत को नर्क कहने वाला अमेरिका खुद की बदहाली पर क्यों है खामोश? 40% भारतीयों का हुआ मोहभंग

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सनबीर सिंह रणहोत्रा

अमेरिका हमेशा से खुद को दुनिया के लिए एक मिसाल के तौर पर पेश करता आया है. वहां की सरकारें और मीडिया यह दावा करते हैं कि पूरी दुनिया के टैलेंटेड और मेहनती लोगों के लिए अमेरिका से बेहतर कोई जगह नहीं है. लेकिन हाल ही में जब डोनाल्ड ट्रंप ने माइकल सैवेज के उस बयान को शेयर किया जिसमें भारत और चीन को ‘हेलहोल’ यानी नर्क का गड्ढा कहा गया था, तो इस प्रोपेगेंडा की कलई खुल गई. यह उस सोच का प्रदर्शन था जो अमेरिका के पावरफुल गलियारों में अब आम हो चुकी है. भारत जैसे प्राचीन देश, जिसने दुनिया को जीरो दिया, यूनिवर्सिटी सिस्टम दिया और फिलॉसफी दी, उसे नर्क कहना अमेरिका के अहंकार को दिखाता है.

आज अमेरिका के अंदरूनी हालात ऐसे हो चुके हैं कि वहां रहने वाले भारतीय अपनी सुरक्षा को लेकर डरे हुए हैं. कार्नेगी एंडोमेंट और यूगोव (YouGov) के फरवरी 2026 के सर्वे ने जो आंकड़े पेश किए हैं, वो चौंकाने वाले हैं. इस सर्वे के अनुसार 40 परसेंट भारतीय अमेरिकी अब वहां से निकलने की सोच रहे हैं. इसमें से 58 परसेंट लोग वहां की गंदी राजनीति से परेशान हैं, जबकि 54 परसेंट बढ़ती महंगाई को झेल नहीं पा रहे हैं. सबसे बड़ी बात यह है कि 41 परसेंट लोगों को अपनी जान-माल की सुरक्षा की चिंता सता रही है. यह उस देश का हाल है जो खुद को दुनिया का पुलिसमैन और सबसे सुरक्षित जगह बताता है.

‘भारतीयों के लिए अमेरिका में डर का माहौल बढ़ रहा’

  • अमेरिका में रहने वाले 54 लाख से ज्यादा भारतीय वहां की इकोनॉमी की रीढ़ हैं. उन्होंने वहां बड़ी कंपनियां बनाईं, रिसर्च में योगदान दिया और वहां के समाज को समृद्ध किया. इसके बावजूद आज हालात ऐसे हैं कि करीब 33 परसेंट भारतीयों ने भेदभाव के डर से सोशल मीडिया पर अपनी राय देना बंद कर दिया है.
  • सर्वे बताता है कि हर पांच में से एक भारतीय अब अमेरिका से बाहर जाने और वापस आने की प्रक्रिया से बचता है क्योंकि वीजा और इमिग्रेशन के नाम पर उन्हें परेशान किए जाने का डर रहता है.
  • हैरानी की बात तो यह है कि 19 परसेंट भारतीयों ने डर की वजह से सार्वजनिक जगहों पर भारतीय कपड़े पहनना भी छोड़ दिया है. जो देश अपनी विविधता और कल्चरल फ्रीडम का ढिंढोरा पीटता है, वहां एक कम्युनिटी को अपनी पहचान छिपानी पड़ रही है.
  • यह दिखाता है कि अमेरिका का ‘नेशन ऑफ इमिग्रेंट्स’ वाला नैरेटिव सिर्फ किताबों और भाषणों तक सीमित रह गया है. असलियत में वहां बाहरी लोगों के लिए नफरत और शक का माहौल बढ़ता जा रहा है.
  • यह माहौल रातों-रात नहीं बना है, बल्कि इसके पीछे दशकों की वो सोच है जो सिर्फ जरूरत पड़ने पर बाहरी टैलेंट का इस्तेमाल करती है और काम निकल जाने पर उन्हें बोझ समझने लगती है.

गन वायलेंस और असुरक्षा के मामले में अमेरिका कहां खड़ा है?

जब अमेरिका भारत या दूसरे देशों को ‘नर्क’ कहता है, तो वह अपने घर के अंदर झांकना भूल जाता है. साल 2024 के आंकड़े बताते हैं कि अमेरिका के स्कूलों में 336 बार गोलीबारी की घटनाएं हुईं. इसका मतलब है कि वहां हर हफ्ते 6 से 7 बार स्कूलों में गोलियां चलती हैं.

अगर सबसे सख्त पैमानों पर भी देखा जाए, तो कम से कम महीने में तीन बार ऐसी घटनाएं होती हैं जिनमें बच्चे मारे जाते हैं या घायल होते हैं. अमेरिका में बच्चों और किशोरों की मौत का सबसे बड़ा कारण कैंसर या एक्सीडेंट नहीं, बल्कि बंदूकें हैं.

स्कूलों में गोलियां और सड़कों पर डर, क्या यही है सुपरपावर अमेरिका की हकीकत? (Photo : AP)

क्या दुनिया का कोई भी सभ्य देश ऐसा हो सकता है जहां 8 साल के मासूम बच्चों को स्कूल शुरू होने से पहले ‘एक्टिव शूटर ड्रिल’ की प्रैक्टिस कराई जाए? भारत और चीन जैसे देशों में अपनी समस्याएं हो सकती हैं, लेकिन वहां कम से कम मां-बाप को यह डर नहीं सताता कि उनका बच्चा स्कूल जाकर वापस घर लौटेगा या नहीं.

अमेरिका जिस सभ्यता के शिखर पर बैठने का दावा करता है, वह दावों की चमक अब फीकी पड़ चुकी है. वह दूसरे देशों से टैलेंट तो खींचना चाहता है, लेकिन उन्हें एक सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन देने में नाकाम साबित हो रहा है.

क्या टैलेंटेड लोग अब अमेरिका से दूरी बना रहे हैं?

सर्वे में एक और दिलचस्प बात सामने आई है कि जो 40 परसेंट लोग अमेरिका छोड़ना चाहते हैं, उनमें सबसे ज्यादा युवा और हाईली एजुकेटेड प्रोफेशनल्स हैं. यह अमेरिका की इकोनॉमी के लिए खतरे की घंटी है.

खास बात यह है कि ये लोग सिर्फ भारत वापस आने की नहीं सोच रहे, बल्कि कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप के देशों की तरफ देख रहे हैं. उन्हें लगता है कि वहां का इमिग्रेशन सिस्टम ज्यादा स्थिर है और वहां उन्हें कम से कम नफरत का सामना नहीं करना पड़ेगा.

अमेरिकी बिजनेस लीडर्स लगातार सरकार को चेतावनी दे रहे हैं कि अगर यही रवैया रहा तो देश का टैलेंट बेस खत्म हो जाएगा.

जब किसी देश का राष्ट्रपति ही खुलेआम किसी खास कम्युनिटी या देश को नीचा दिखाने वाले बयान देता है, तो उसका असर केवल डिप्लोमेसी पर नहीं पड़ता, बल्कि वहां रहने वाले लोगों के भरोसे पर पड़ता है.

भारतीयों ने अमेरिका को अपना घर माना था, लेकिन अब उन्हें लगने लगा है कि वे वहां कभी भी पूरी तरह स्वीकार नहीं किए जाएंगे.

अमेरिकन ड्रीम के पीछे का कड़वा ऐतिहासिक सच क्या है?

  1. हकीकत तो यह है कि ‘अमेरिकन ड्रीम’ की इमारत असल में कब्रगाहों पर बनी है. अमेरिका का उदय ही वहां के मूल निवासियों के नरसंहार और अफ्रीकी लोगों की गुलामी पर टिका हुआ है. इस सच को अमेरिका ने हमेशा अपनी कहानियों के नीचे दबाकर रखा है.
  2. भारतीयों के लिए भी अमेरिका का प्यार हमेशा से शर्तों पर आधारित रहा है. जब उन्हें सस्ते और कुशल लेबर की जरूरत होती है, वे दरवाजा खोल देते हैं और जब अपनी राजनीति चमकानी होती है, तो वे इन्हीं लोगों को निशाना बनाने लगते हैं.
  3. जो लोग आज एच-1बी (H-1B) वीजा के लिए सालों इंतजार कर रहे हैं, उन्हें यह समझना होगा कि अमेरिका की सिस्टमैटिक रुकावटें कोई इत्तेफाक नहीं हैं. यह सब एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है. ट्रंप का रीट्वीट इसी विचारधारा का सबसे नया और नग्न रूप है.

जब देश का सर्वोच्च पद पर बैठा व्यक्ति भारत को नर्क कहता है, तो यह सफाई देना बेकार है कि वह केवल किसी और की बात दोहरा रहा था. संदेश साफ है और अमेरिका में रहने वाला हर भारतीय इसे अब गहराई से महसूस कर रहा है.

अमेरिका का असली चेहरा: भारतीयों के लिए क्या अब नर्क बन चुका है सपनों का देश? (File Photo : Reuters)

क्या भविष्य में भारतीय अमेरिका से पूरी तरह किनारा कर लेंगे?

यह सवाल अब केवल इमोशनल नहीं रह गया है, बल्कि प्रैक्टिकल हो चुका है. जब 40 परसेंट टैलेंट देश छोड़ने की बात करता है, तो वह देश अपनी तरक्की की रफ्तार खोने लगता है. अमेरिका के पास बड़ी यूनिवर्सिटीज और कैपिटल मार्केट हो सकता है, लेकिन उसके पास अब वह सुरक्षित सामाजिक वातावरण नहीं है जो किसी भी इंसान की पहली जरूरत होती है. भारतीय अब यह सोचने पर मजबूर हैं कि क्या केवल पैसे के लिए अपनी पहचान और सुरक्षा को दांव पर लगाना सही है.

आज का युवा भारतीय अब पुराने ढर्रे पर नहीं चलना चाहता. उसे पता है कि दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी मौके हैं. कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और खुद भारत का बढ़ता बाजार अब उन्हें बेहतर विकल्प दे रहे हैं. अमेरिका का अहंकार उसे यह देखने से रोक रहा है कि वह खुद उस नर्क की तरफ बढ़ रहा है जिसका इल्जाम वह दूसरों पर लगाता है. अगर अमेरिका ने अपनी नीतियों और जुबान पर लगाम नहीं लगाई, तो वह दिन दूर नहीं जब ‘अमेरिकन ड्रीम’ केवल एक डरावना सपना बनकर रह जाएगा.

‘अमेरिका अब खुद एक टूटे हुए आइने की तरह है’

अंत में यही कहा जा सकता है कि अमेरिका जिस आइने में पूरी दुनिया को ‘नर्क’ के रूप में देखता है, असल में वह आइना खुद टूटा हुआ है. अपनी कमियों को छिपाने के लिए दूसरों को नीचा दिखाना कमजोरी की निशानी है. भारतीयों के लिए अब यह समय सचेत होने का है. अमेरिका का असली चेहरा अब सबके सामने है. वहां की सड़कों पर बढ़ती नफरत, स्कूलों में गन कल्चर और नेताओं की बदजुबानी यह साबित करती है कि सुपरपावर होने का मतलब सभ्य होना नहीं होता.

भारतीय अमेरिकी अब अपनी जड़ों की तरफ देख रहे हैं. वे समझ रहे हैं कि जिस देश ने उन्हें केवल एक मशीन की तरह इस्तेमाल किया, वह कभी उनका अपना नहीं हो सकता. ट्रंप का एक पोस्ट आने वाले बड़े बदलाव की शुरुआत मात्र है. अब फैसला भारतीयों को करना है कि वे उस देश में रहना चाहते हैं जो उन्हें ‘नर्क’ कहता है, या वहां जहां उन्हें सम्मान और सुरक्षा दोनों मिले. अमेरिका को अब आइना खुद देखना होगा, क्योंकि दुनिया अब उसका असली चेहरा देख चुकी है.

(ऊपर दिए गए लेख में बताए गए विचार निजी हैं और सिर्फ लेखक के हैं. जरूरी नहीं कि वे News18हिंदी के विचारों से मेल खाते हों.)

By uttu

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