बिस्किट की बात होती है, तो जुबां पर सबसे पहले पारले-जी (Parle-G) का नाम आता है. सिर्फ बिस्किट ही नहीं, बल्कि पारले कंपनी और भी कई प्रोडक्ट बनाती है, जिनमें एक है मेलोडी टॉफी (Parle Melodi), जो इस समय सबसे ज्यादा चर्चा में है. ऐसा इसलिए क्योंकि देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस टॉफी का पैकेट इटली की पीएम जॉर्जिया मेलोनी को गिफ्ट किया और उन्होंने सोशल मीडिया पर इसका वीडियो शेयर कर पीएम मोदी को थैंक्यू कहा.
मेलोडी बनाने वाली कंपनी Parle का इतिहास आजादी से भी पुराना है और इतने लंबे समय से ये मार्केट में दबदबा बनाए हुए है. भले ही आज इसकी पहचान सबसे ज्यादा Parle-G बिस्टिक के लिए है, लेकिन इसका सफर कैंडी से ही शुरू हुआ था. कंपनी ने चॉकलेटी मेलोटी टॉफी साल 1983 में लॉन्च की थी. उस समय कैडबरी ‘एक्लेयर्स’ समेत कई चॉकलेट टॉफी ब्रांड बाजार में अपनी पकड़ जमा रहे थे, तभी पारले ने मेलोडी लॉन्च कर इन्हें तगड़ी टक्कर दी और बाहर कारमेल, अंदर चॉकलेट वाला ये प्रोडक्स आज भी खासा पंसद किया जाता है.
Thank you for the gift pic.twitter.com/7ePxbJwPbA
— Giorgia Meloni (@GiorgiaMeloni) May 20, 2026
12 लोगों के साथ 1928 में पारले की शुरुआत
बच्चे, बूढ़े हों या फिर जवान सभी Parle-G के नाम से वाकिफ हैं. क्योंकि ये सिर्फ के नाम न होकर, लोगों की भावनाओं से जुड़ा हुआ है. इसका नाम आते ही बुजुर्ग भी अपने बचपन में लौट जाते हैं. समय के साथ इस बिस्टिक की पैकेजिंग से दाम तक बदला, लेकिन इसका स्वाद जैसे का तैसा है.
पारले की शुरुआत की बात करें, तो पारले प्रोडक्ट्स को ‘हाउस ऑफ पारले’ (House of Parle) कंपनी के तहत शुरू किया गया था. इसकी स्थापना गुजरात के वलसाड के पास स्थित पारडी के रहने वाले मोहनलाल दयाल चौहान ने अपने परिवार के 12 लोगों के साथ 1929 में की थी. जानकारी के मुताबिक, उनका पेशा सिलाई-कढ़ाई का था, लेकिन कुछ बड़ा करने का सपना लेकर वे मुंबई आ गए थे. उस समय भारत में आजादी की जंग जारी थी, स्वदेशी आंदोलन चल रहा था. उसी समय मोहनलाल दयाल ने मुंबई के विले पार्ले में एक पुरानी फैक्टरी में कन्फेक्शनरी यूनिट तैयार की और इसमें बनने वाला पहला प्रोडक्ट ‘रेंज कैंडी’ था, जिसे बाद में पारले कैंडी नाम दिया गया.

जर्मनी से ली ट्रेनिंग, भारत में मचाया धमाल
मोहनलाल दयाल कन्फेक्शनरी यूनिट की शुरुआत करने से पहले इस सेक्टर की बारीकियों को समझा था और इसकी पूरी ट्रेनिंग जर्मनी से लेकर आए थे. शुरआत में उनकी कंपनी कैंडी के फेमस होने के साथ ही उनके दिमाग में कारोबार विस्तार का प्लान आया, हालांकि नया प्रोडक्ट लाने में 10 साल का समय लग गया और पारले ने पहली बार 1938 में पारले-ग्लूको (Parle-Gloco) नाम से बिस्किट का उत्पादन शुरू किया. आजादी से पहले पारले-जी (Parle-G) का नाम ग्लूको बिस्किट (Gluco Biscuit) हुआ करता था.
पारले-जी देखते देश के लोगों की पसंद बनता गया और इसका बिजनेस भी तेजी से बढ़ा. साल 2011 में हुए नील्सन सर्वे के मुताबिक, पारले-जी दुनिया में बेस्ट सेलिंग बिस्किट ब्रांड था. शुरुआती दौर में परिवार के 12 लोगों के साथ हुआ पारले का सफर अब देश के करीब 30 लाख से ज्यादा रिटेल स्टोर्स तक पहुंच चुका है.
एक पुरानी रिपोर्ट की मानें, तो देश में प्रति सेकेंड 4,000 से ज्यादा Parle-G बिस्किटों की खपत होती है. पॉपुलैरिटी के साथ ही इसका ब्रांड पोर्टफोलियो भी तेजी से बढ़ा है. पारले कंपनी का बिजनेस तीन हिस्सों में चलता है. जिनमें Parle-G बनाने वाली पारले प्रोडक्ट्स (Parle Products) के साथ ही पारले एग्रो (Parle Agro) और पारले बिसलेरी शामिल है.
विजय चौहान संभालते हैं कारोबार
विजय चौहान एंड फैमिली Parle Products को कंट्रोल करता है. यह कंपनी अपने मशहूर ग्लूकोज बिस्किट, Parle G के लिए सबसे ज्यादा जानी जाती है, जिसे 1939 में लॉन्च किया गया था. बिस्किट, कन्फेक्शनरी और स्नैक्स बनाने वाली यह प्राइवेट कंपनी अपनी अनुमानित 2 अरब डॉलर की ज्यादातर कमाई बिस्किट से ही करती है.
2021 में कंपनी ने अपने प्रोडक्ट पोर्टफोलियो का विस्तार किया, कंपनी की भारत से बाहर 8 देशों में फैक्ट्रियां हैं, जिनमें मेक्सिको भी शामिल है. विजय चौहान के बेटे अजय और उनके भतीजे Parle में काम करते हैं.
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