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S-400 और THAAD भूल जाइए, DRDO बना रहा सबका बाप! मामूली खर्च में कर देगा मिसाइलों और ड्रोन्स का काम तमाम

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S-400, THAAD और आयरन डोम भूल जाइए, DRDO बना रहा सबका बाप! खर्चा भी है मामूली

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Project Kusha Latest Update: भारत का प्रोजेक्ट कुशा एक स्वदेशी लंबी दूरी का एयर डिफेंस सिस्‍टम है जिसे भारत का S-400 कहा जा रहा है. DRDO द्वारा विकसित यह सिस्‍टम 350 किमी तक की रेंज में विमानों, मिसाइलों और ड्रोन्स को नष्ट करने में सक्षम है. अमेरिकी थाड की टक्‍कर का यह एयर डिफेंस सिस्‍टम है. इसकी कीमत विदेशी सिस्‍टम के मुकाबले एक तिहाई से भी कम है.

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स्वदेशी सुरक्षा कवच का उदय: प्रोजेक्ट कुशा भारत की सबसे महत्वाकांक्षी रक्षा परियोजना है जिसे ‘स्वदेशी S-400’ के रूप में पहचाना जा रहा है. रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) द्वारा विकसित यह लंबी दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल प्रणाली (L-RSAM) भारत को उन चुनिंदा देशों की कतार में खड़ा करेगी जिनके पास खुद का उन्नत वायु सुरक्षा तंत्र मौजूद है. इसकी कीमत विदेशी थाड और एस-400 सिस्‍टम के मुकाबले एक तिहाई से भी कम है.

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बहुस्तरीय मारक क्षमता और रेंज: इस सिस्‍टम की सबसे बड़ी खूबी इसकी बहुस्तरीय मारक क्षमता है. यह दुश्मन के खतरों को तीन अलग-अलग श्रेणियों—150 किमी, 250 किमी और अधिकतम 350 किमी में मार गिराने में सक्षम है. यह विविधता भारतीय वायु सेना को एक ऐसा लचीला सुरक्षा जाल प्रदान करती है जिससे दुश्मन का कोई भी विमान या मिसाइल बचकर नहीं निकल सकता.

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घातक पेलोड और वारहेड्स: मिसाइल की सटीकता के साथ-साथ इसका प्रहार भी अत्यंत विनाशकारी है. इसमें उच्च-विस्फोटक (HE) और प्री-फ्रेगमेंटेड वारहेड्स का उपयोग किया जाता है. यह पेलोड दुश्मन के लड़ाकू विमानों, भारी ट्रांसपोर्ट जहाजों, क्रूज मिसाइलों और यहां तक कि छोटे ड्रोन्स को भी हवा में ही जलाकर राख कर देने की अद्भुत क्षमता रखता है, जिससे जमीनी सुरक्षा सुनिश्चित होती है.

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अदृश्य शत्रुओं की पहचान: प्रोजेक्ट कुशा में लगा रडार और फायर कंट्रोल सिस्टम रूसी S-400 से भी अधिक आधुनिक होने की उम्मीद है. यह तकनीक ‘स्टील्थ’ यानी रडार की नजरों से बचने वाले अदृश्य विमानों को भी आसानी से ट्रैक कर सकती है. यह आधुनिक इंटेलिजेंस सिस्टम खतरे की पहचान कर उसे नष्ट करने के लिए ऑटोमैटिक रिस्पॉन्स देने में सक्षम है.

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लागत और आत्मनिर्भरता: लगभग 21,700 करोड़ रुपये की शुरुआती लागत वाला यह प्रोजेक्ट भारत के रक्षा बजट के लिए एक किफायती विकल्प है. रूसी S-400 की तुलना में इसकी विकास और मेंटेनेंस लागत काफी कम होगी. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पूरी तरह स्वदेशी होने के कारण युद्ध जैसी स्थितियों में भारत को कलपुर्जों या सॉफ्टवेयर के लिए किसी विदेशी शक्ति पर निर्भर नहीं रहना होगा.

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आयरन डोम से श्रेष्ठता: हालांकि इसकी तुलना अक्सर इजराइल के आयरन डोम से की जाती है, लेकिन कुशा रणनीतिक रूप से उससे कहीं अधिक शक्तिशाली है. आयरन डोम मुख्य रूप से छोटी दूरी के रॉकेटों को रोकने के लिए बना है, जबकि कुशा एक ‘लॉन्ग-रेंज’ डिफेंस सिस्टम है जो लंबी दूरी के रणनीतिक खतरों और उच्च गति वाले लड़ाकू विमानों को उनके अपने हवाई क्षेत्र में ही खत्म कर सकता है.

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रणनीतिक भविष्य और तैनाती: भारतीय वायु सेना इस अभेद्य सुरक्षा कवच को 2028-29 तक अपने बेड़े में शामिल करने की योजना बना रही है. इसकी तैनाती के बाद चीन और पाकिस्तान जैसे पड़ोसियों के साथ लगने वाली सीमाओं पर एक ‘नो-फ्लाई ज़ोन’ जैसा माहौल तैयार हो जाएगा. यह न केवल सीमाओं को सुरक्षित करेगा, बल्कि भविष्य में भारत को एक वैश्विक मिसाइल निर्यातक भी बना सकता है.

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By uttu

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