Thalapathy Vijay TVK: तमिलनाडू में सरकार बनाने को लेकर उठापटक मची हुई है. 108 सीटें लाकर सबसे बड़ी पार्टी बनी थलापति विजय की टीवीके पूरा बहुमत नहीं जुटा पा रही. हंग असेंबली बनी तमिलनाडू विधानसभा को लेकर संभावना जताई जा रही है कि गर्वनर विजय के बजाय किसी अन्य पार्टी को भी तमिलनाडू में सरकार बनाने का मौका दे सकते हैं. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल लोगों के मन में आ रहा है कि अगर गर्वनर ने अन्य पार्टियों को मौका दिया तो क्या विजय का सीएम बनने का सपना चकनाचूर हो जाएगा?
तो बता दें कि विजय थलापति गवर्नर के किसी भी फैसले को नहीं रोक सकते हैं लेकिन उनके पास सीएम बनने का एक और मजबूत रास्ता है और वह है सुप्रीम कोर्ट. थलापति सुप्रीम कोर्ट में अपील कर सकते हैं और सुप्रीम कोर्ट फ्लोर टेस्ट का आदेश दे सकता है. अभी तक कई राज्यों में हुई हंग असेंबली के मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप कर फ्लोर टेस्ट के आदेश दिए हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने दिए हैं कई ऐतिहासिक फैसले
जब कोई पार्टी गठबंधन के विकल्पों के पूरा करने के बाद भी बहुमत नहीं जुटा पाती तो हंग असेंबली की स्थिति उत्पन्न हो जाती है. ऐसे में गवर्नर की भूमिका, सरकार गठन का दावा और फ्लोर टेस्ट जैसे मुद्दे सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच जाते हैं. सुप्रीम कोर्ट ने कई ऐतिहासिक फैसलों में साफ किया है कि बहुमत का परीक्षण विधानसभा के फ्लोर पर ही होना चाहिए, न कि राजभवन में.
पहले भी सुप्रीम कोर्ट पहुंची पार्टियां, हुआ फैसला
जब वैकल्पिक सरकार की बात की गई..
एस आर बोम्मई बनाम भारत संघ (1994) सबसे महत्वपूर्ण फैसला है. कर्नाटक में जनता दल सरकार के मुख्यमंत्री एसआर बोम्मई के खिलाफ 19 विधायकों के समर्थन वापस लेने का दावा किया गया. गवर्नर ने रिपोर्ट भेजी और राष्ट्रपति शासन (आर्टिकल 356) लग गया. इस पर सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बेंच ने फैसला दिया कि…
- बहुमत का परीक्षण फ्लोर ऑफ द हाउस पर ही होना चाहिए
- गवर्नर या राष्ट्रपति का व्यक्तिगत आकलन पर्याप्त नहीं
- राष्ट्रपति शासन का दुरुपयोग रोका जाए
- हंग असेंबली में वैकल्पिक सरकार बनाने की कोशिश की जानी चाहिए, बिना जल्दबाजी में असेंबली भंग किए
- बता दें कि इस फैसले का उदाहरण आज भी हंग असेंबली के हर मामले में सबसे ज्यादा दिया जाता है.
दूसरा मामला- रमेश्वर प्रसाद बनाम भारत संघ (2006)
बिहार हंग असेंबली- 2005 के बिहार चुनावों में हंग असेंबली बनी. गवर्नर ने राष्ट्रपति शासन की सिफारिश की और असेंबली भंग कर दी. इस दौरान NDA गठबंधन ने दावा किया कि उनके पास पोस्ट-पोल सपोर्ट है.
सुप्रीम कोर्ट ने असेंबली भंग करने को असंवैधानिक करार दिया. कोर्ट ने कहा कि अगर कोई पार्टी या गठबंधन गवर्नर को बहुमत साबित करने का दावा करता है, तो गवर्नर इसे नकार नहीं सकता. बहुमत की जांच फ्लोर टेस्ट से ही होनी चाहिए.
तीसरा केस- कर्नाटक 2018: बीएस येडियुरप्पा बनाम कांग्रेस-JD(S)
कर्नाटक विधानसभा चुनाव 2018 में चुनाव के बाद BJP सबसे बड़ी पार्टी बनी लेकिन सीटें बहुमत से कम रह गईं. गवर्नर ने येदियुरप्पा को सीएम बनाया और 15 दिन का समय दिया.
कांग्रेस-JD(S) गठबंधन सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. कोर्ट ने अगले ही दिन फ्लोर टेस्ट का आदेश दिया. येदियुरप्पा बहुमत साबित नहीं कर पाए और इस्तीफा देना पड़ा.
ये हैं अन्य मामले
- – महाराष्ट्र 2019 शिवसेना, NCP और कांग्रेस का गठबंधन बनाम BJP हंग असेंबली केस में गवर्नर ने देवेंद्र फडणवीस को शपथ दिलाई.लेकिन विपक्ष के सुप्रीम कोर्ट जाने पर अगले दिन फ्लोर टेस्ट का आदेश दिया. फडणवीस ने इस्तीफा दे दिया. कोर्ट ने फिर फ्लोर टेस्ट को अंतिम फैसला माना.
- जगदंबिका पाल (1999) — उत्तर प्रदेश में गवर्नर ने एक सरकार बनाई, लेकिन फ्लोर टेस्ट में कल्याण सिंह ने बहुमत साबित किया और कोर्ट ने फ्लोर टेस्ट को मान्यता दी.
- नबाम रेबिया — अरुणाचल प्रदेश में भी सुप्रीम कोर्ट ने गवर्नर की भूमिका पर सख्त टिप्पणी की. वहीं मध्य प्रदेश और गोवा केस में भी सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार फ्लोर टेस्ट पर जोर दिया.
सुप्रीम कोर्ट के इन फैसलों से साफ कि या बहुमत राजभवन में नहीं, सदन में साबित होता है. गवर्नर को सबसे पहले उस दल या गठबंधन को बुलाना चाहिए जो स्थिर सरकार बनाने का दावा करे. अगर कोई दावा नहीं तो फ्लोर टेस्ट अनिवार्य है. नए चुनाव अंतिम विकल्प होना चाहिए.
